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Friday, November 08, 2013

2Lines {9-Oct-2013}: ख़ामोश चेहरे



ख़ामोश चेहरे यूं बोल उठते हैं, ग़ुलशन-ए-बेबाक के फरमान हो गये |

वो खूब कहे, रुक रुक के कहे, फिर यकायक ही चुप सरेआम हो गये |

Thursday, September 23, 2010

Poetry {24/Sep/2010} - III : रब में यकीं करने वाले से क्यूँ प्यार नही करते

है वतन नहीं आसां किस्मत से जो लड़ पाना,


क्यूँ अपनी मन्नतों पे एतबार नहीं करते |


आख़िर अरमां भी तो उन्ही के होते हैं पूरे,


अश्क़-ए-हालात में जो अक्स पे वार नही करते |


गयी सदिया बस किसी करिश्में के इंतेज़ार में,


क्यूँ अपने बाजू दिमाग़ पे इख्तियार नही करते |


हो मस्जिद, हो मंदिर, सबमें रब का डेरा है,


उसमें यकीं करने वाले से क्यूँ प्यार नही करते |


~=ABK=~
PS: spread PEACE, not Politics 

Poetry {23/Sep/2010} - II : मह्कत प्रीति

मूल नही, धूल नही,
यथार्थ के शूल नही,
जब प्रीति मह्कत है,
तब चंदन फूल नही|
~=ABK=~

Poetry {23/Sep/2010} : प्रीति में जल

जलना है तो प्रीति में जल, 
ये अभेद तरल है ग़ूढ सरल| 
~=ABK=~